व्यंग्य: सेवा के धंधे में बड़े अच्छे रिटर्न हैं!

नीरज बधवार. नई दिल्ली
चुनावों से पहले हर पार्टी दफ्तर के बाहर कार्यकर्ताओं की फौज लगी है। हर किसी की यही कोशिश है कि जैसे-तैसे उसे टिकट मिल जाए और वो जनता की सेवा कर पाए। जनता की सेवा करने की तड़प ऐसी है कि टिकट न मिलने पर लोग मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं। एक-दूसरे के सिर फोड़ देते हैं, गाली-गलौज करते हैं, लहूलुहान हो जाते हैं।

आप अपने आसपास नज़र दौड़ाएं तो पाएंगे कि सेवा को लेकर ऐसी मारा-मारी शायद ही किसी और फील्ड में देखने को मिलती हो। और ऐसा भी नहीं कि सेवा की ये प्यास सिर्फ विधायक बनने पर शांत हो जाती है। कोरा विधायक या सांसद बनने पर इन्हें व्यर्थता बोध सताने लगता है। ये महसूस करते हैं कि सेवा करने के जो ‘मंसूबे’ लेकर ये राजनीति में आए थे, वो तब तक पूरे नहीं हो सकते, जब तक कि इन्‍हें कोई मंत्री पद न मिल जाए।

तभी तो हाल ही में बीजेपी में शामिल हुई अपर्णा यादव को ही ले लीजिए। वो समाजवादी पार्टी में रहते हुए बड़े अच्छे से गौसेवा भी कर रहीं थी। मगर उनमें जनता की सेवा का इतना क्रेज़ था कि वो अपनी पारिवारिक पार्टी छोड़कर बीजेपी में आ गई।

जिस उम्र में लोग डर के मारे किसी OTT प्लेटफॉर्म की Annual Membership नहीं लेते उस 94 साल की उम्र में प्रकाश सिंह बादल फिर से विधायक बनकर 5 साल के लिए जनता की सेवा करना चाह रहे हैं। ये जनता की सेवा का ही जुनून है कि इतनी पार्टियां बदलने के बाद भी स्वामी प्रसाद मौर्या के आत्मा जनसेवा के लिए आज भी तड़प रही है। ये जन सेवा की कसक है कि आज़म खान जेल में रहते हुए भी जनता की सेवा करने के लिए मरे जा रहे हैं। ये जन सेवा का ही मोह है कि विधानसभा चुनाव आता है तो अखिलेश को लगता है वो विधायक बनकर जनता की सेवा करें और लोकसभा चुनाव आते ही वो सांसद बन जनता के सेवक हो जाना चाहते हैं। ये जनसेवा का ही जुनून है कि नवजोत सिंह सिद्धू को लगता है कि पंजाब की जनता को सिर्फ और सिर्फ उनके हाथों ही अपनी सेवा करवानी चाहिए। कैप्टन से लेकर चन्नी तक कोई और जनता की सेवा करे ये सिद्धू को गंवारा नहीं।

कभी-कभी मुझे लगता है कि ये हमारे नेताओं की नेकनीयत ही है कि दिन-रात जनता की सेवा करने और करते रहने के बावजूद हर चुनावों में उनकी सम्पत्ति कई गुणा बढ़ जाती है। ये उनके सेवा भाव के बदले हुई ईश्वर की असीम कृपा ही है…वरना ऐसा कैसे हो सकता है कि जो लोग घोर स्वार्थी होकर दिन रात काम धंधे में चलाने में लगे हैं वो फिर कोरोना काल में अपने बिज़नेस प्रॉफिट में नहीं पा रहे और 24 में से 26 घंटे जनता की सेवा करने वाले नेताओं की दौलत हर चुनावों में पहले के मुकाबले कई गुणा बढ़ जाती है।

ये ईश्वर का चमत्कार नहीं तो और क्या है…ऐसे समय जब दुनियाभर के शेयर बाज़ार डांवाडोल हो रहे हैं, एफडी पर रिटर्न मिल नहीं रहा, प्रापर्टी का धंधा मंदा पड़ा है, क्रिप्टोकरेंसी भी नीचे जा रही है… उस अपरमपारी ने इनसे उन स्टॉक्स में निवेश कराया, जो सबसे ज़्यादा ग्रो होने वाले थे, इनके दलाल मित्र ने इन्हें शहर में उस मौके वाली जगह प्लॉट दिलवाया जिसकी कीमत कई गुणा बढ़ने वाली थी।

जनसेवा के दौरान वो जैसे-जैसे पैसे की व्यर्थता समझते गए, ईश्वर ये सोचकर इनकी दौलत में इजा़फा करता गया कि कल जब ये सबकुछ दान कर स्विस एलेप्स के पहाड़ों पर जाना चाहें, तो दान के लिए इन्हें पास पैसों की कमी न पड़े। इसलिए अगर आप भी फटीचरपने से परेशान हैं तो आज ही अपने सेवा भाव में आक्रमकता लाइए।

अगर कोई शख्स किसी बुज़ुर्ग को सड़क क्रॉस करवा रहा है तो उसे धक्का दे कहिए अबे चलबे, हट यहां से… मैं करवाऊँगा अंकल को सड़क क्रॉस। अगर बुज़ुर्ग कहे कि नहीं बेटा, मैं ऐसे ही ठीक हूं, तो ये कहते हुए भिड़ जाइए कि ऐसे कैसे ठीक है…मैं देखता हूं कि तुम मुझे कैसे खुद को सड़क क्रॉस करवाने से रोकते हो!

इसके बाद भी अगर वो चुं-चपड़ करें तो उनसे ही भिड जाइए, हाथापाई कीजिए, सिर फोड़िए, टांग तोड़िए और जब टांग टूट जाए, तो उन्हें गोदी में उठाकर सड़क पार करवा दें। क्योंकि ये न भूलें कि आपको हर हाल में सेवा करनी है और सेवा करके नेताओं की तरह ईश्वरीय कृपा का पात्र बनना है ताकि आपका खाली पात्र भी चंद करोड़ रूपयों से भर पाए।

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