व्यंग्य: बजट से आम आदमी की मासूम उम्मीदें!

नीरज बधवार
उम्मीद, मेरा प्रिय कर्म है। जब चाहें, जहां चाहें, जितनी चाहें और जिससे चाहें आप मुझसे उम्मीद करवा सकते हैं। मैं वक़्त और सीज़न के हिसाब से लोग चुनता हूं। उनके लिए मापदंड तय करता हूं और बताता हूं कि वो मेरी उम्मीदों पर ख़रे उतरे या नहीं।

अभी कल ही निर्मला सीताफल जी ने सॉरी, सीतारमण जी इस साल का बजट पेश किया है। मगर सिवाए ठेंगे के आम आदमी को इस बजट से कुछ नहीं मिला।

मुझे उम्मीद थी कि वो कर मुक्त आय की सीमा 20 लाख कर देंगी। कर चोरी से सीमा हटा देंगी। मेरे प्रिय सोया चाप पर सब्सिडी दिलवाएंगी। उसकी पर पल्टे 20 रुपए करवा देंगी। रसोई के नल में शाम 8 से 9 दारू की सप्लाई करवाएंगी। मल्टीप्लेक्स का टिकट 10 का करवा देंगी… 300 रुपए के पॉपकोर्न की जगह मूवी हॉल में झालमूड़ी की रेहड़ी लगवाएंगी और तीस रूपये के महंगे मिनरल वॉटर से बचाने के लिए पिक्चर हॉल में ही हैंडपंप लगवा देंगी, मगर ऐसा भी नहीं हुआ।

वहीं रेल बजट में भी वो बंदे भारत ट्रेनों का ही ऐलान करके ही रह गईं। जबकि मुझे उम्मीद थी कि वो फर्स्ट क्लास में डबल बेड लगवाएंगी, सेकेंड क्लास में एसी और साधारण डिब्बे में कूलर। मुझे पक्का यकीन था कि वो 25 रूपये के पास में पैलेस ऑन व्हील्स का सफर भी शामिल करेंगी। सामान्य किराए पर तत्काल का टिकट देंगी! हर यात्री को मुफ्त खाना देंगी और ऐसा खाना खा बीमार पड़ने वालों की दवा भी करवाएंगी, मगर ये सब भी नहीं हुआ।

मुझे उम्मीद थी कि अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद जिनपिंग कोरोना पर अपनी गलती के लिए मुर्गा बनकर माफी मांगेगें, किंग जोंग शांति के रास्ते में चलते हुए लद्दाख में मोमोज़ बेचने लगेगा… पड़ोसी मंगलू की नई जरसी गाय 220 लीटर दूध देगी, उसका बेटा आड़ूराम दसवीं में नब्बे फीसदी अंक लाएगा, उसकी बहन कचरा देवी अपने ससुराल से मेरे लिए हाथ से बुना नया स्वेटर लाएगी और शादी से पहले कटरीना फोनकर मुझसे कहेगी…अब भी वक्त है ‘हां’ कर दो….मगर उस अभागी ने ये भी नहीं पूछा।

मन भारी हो गया है। गुस्से और अवसाद से घिर गया हूं। दिल कर रहा है मिट्टी का तेल डाल पूरी दुनिया को आग लगा दूं और सारे अग्निशमन यंत्र दरिया में फेंक दूं। क्यों…आख़िर क्यों…ये दुनिया मेरी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती। परेशान हूं। नहीं जानता क्या करूं।

कभी-कभी सोचता हूं कि दुनिया को छोड़, खुद से कुछ उम्मीद कर लूं। फिर ख़्याल आता है कि नहीं, मैं आम आदमी हूं। मुझे सारी उम्मीदें दूसरों से ही करनी है। वैसे भी दुनिया को आग लगाना, आत्मदाह करने से कहीं ज़्यादा आसान है!

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